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बटेश्वर कार्तिक पूर्णिमा

बटेश्वर कार्तिक पूर्णिमा   कार्तिक हिंदू कैलेंडर में आठवां चंद्र माह है। कार्तिक मास की पूर्णिमा को कार्तिक पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। बटेश्वर क्षेत्र के आधार पर,  वैष्णव परंपरा में कार्तिक मास को दामोदर मास के नाम से जाना जाता है। दामोदर भगवान कृष्ण के नामों में से एक है।हिंदू कैलेंडर में, कार्तिक सभी चंद्र महीनों में सबसे पवित्र महीना है। कई लोग कार्तिक महीने के दौरान हर दिन सूर्योदय से पहले गंगा और अन्य पवित्र नदियों में पवित्र डुबकी लगाने का संकल्प लेते हैं। कार्तिक माह के दौरान पवित्र डुबकी की रस्म शरद पूर्णिमा के दिन शुरू होती है और कार्तिक पूर्णिमा पर समाप्त होती है।  बटेश्वर पूनम कब की है? हिंदू कैलेंडर में पूर्णिमा के दिन को पूर्णिमा, पूनो, पूनम, पूर्णमी और पूर्णिमासी के रूप में भी जाना जाता है। बटेश्वर पूनम कब की है? बटेश्वर पूनो से तात्पर्य कार्तिक पूर्णिमा से है बटेश्वर पूर्णिमा 2021, 19 नवंबर शुक्रवार की है और बटेश्वर पूर्णिमा 2022, 08  नवंबर मंगलवार की है  कार्तिक पूर्णिमा का क्या महत्व है? बटेश्वर में कार्तिक पूर्णिमा स्नान का बहुत महत्वा है क्योंकि कार्तिक पूर्णिम

बटेश्वर धाम से गहरा नाता है कृष्ण कन्हैया का !

बटेश्वर धाम से गहरा नाता है कृष्ण कन्हैया का ! तीर्थों का भांजा कहे जाने वाले बटेश्वर से कृष्ण कन्हैया का गहरा नाता रहा है। यमुना नदी के तट पर बसे इस तीर्थ स्थल की महाभारत काल में भी मुख्य भूमिका रही है। कुंती व कर्ण ने यहां प्रवास किया था, वहीं पांडवों ने अज्ञातवास का कुछ समय यहां बिताया था। बटेश्वर, में श्रीकृष्ण और उनके पूर्वजों के अनेक चिन्ह मिलते हैं । बटेश्वर धाम ब्रज मंडल का ही भाग है और 84 कोस की परिक्रमा में इसका समावेश है।  बटेश्वर तीर्थों का भांजा क्यों है ? श्री कृष्ण के पिता वसुदेव की जन्मभूमि शौरीपुर बटेश्वर मानी जाती है। शौरीपुर का इतिहास में मथुरा के राजा अहुक के दो पुत्रों में जब राज्य बटा तो उग्रसेन को मथुरा मंडल और देवाक को शूरसैन मंडल मिले, उग्रसेन के सात पुत्र हुए जिनमें जेष्ठ कंस था। अहुक के सात पुत्री हुई जिनमें जेष्ठ देवकी थीं  कंस और देवकी दोनों चचेरे भाई बहन में बहुत प्रेम था। बटेश्वर में के शूरसैन के पुत्र वासुदेव की कंस से घनिष्ट मित्रता थी। कालांतर में कंस ने देवकी का विवाह अपने मित्र वासुदेव से किया और फिर आकाशवाणी और आगे कंस कारागार में कृष्ण जनम की कथा स

शौरीपुर का इतिहास-तीर्थंकर नेमिनाथ जन्मभूमि - दिगंबर जैन मंदिर

शौरीपुर का इतिहास-तीर्थंकर नेमिनाथ जन्मभूमि शौरीपुर बटेश्वर का श्री नेमिनाथ जैन मंदिर जैनधर्म का एक पवित्र सिद्धपीठ तीर्थ है। यह जैनधर्म के 22वें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ की जन्म स्थली है। शौरीपुर बटेश्वर में माता शिवादेवी और पिता समुद्रविजय से श्रावण शुक्ला षष्ठी में भगवान श्री नेमिनाथ जी उत्पन्न हुए थे। शौरीपुर बटेश्वर धाम से 04 किमी की दूरी पर यमुना किनारे बीहड़ में स्थित है। बटेश्वर धाम हिन्दू धर्म का प्रसिद्ध शिव तीर्थ होने के साथ ही अतिशय क्षेत्र भी है। बटेश्वर धाम में भगवान शिव के 108 मंदिर है। लेकिन अपने इस लेख में हम जैनतीर्थ शौरीपुर के बारे में ही बात करेंगे।  शौरीपुर में भगवान श्री नेमिनाथ का दिगंबर जैन मंदिर है। जैन समुदाय में इस स्थान का बहुत बड़ा महत्व है। बडी संख्या में यहां जैन श्रृद्धालु वर्ष भर यहाँ आते रहते है। श्री दिगंबर जैन मंदिर शौरिपुर शौरीपुर जैन तीर्थ का महत्व राजा समुद्रविजय की रानी शिवादेवी के गर्भ से श्रावण सुदी 06 को इस शौरीपुर बटेश्वर की इस पवित्र धरा पर भगवान श्री  नेमिनाथ जिनेन्द्र 22वें तीर्थंकर का जन्म हुआ था। उनके जन्म के समय इंद्र ने रत्नों की वर्षा की