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Sunday, December 25, 2016

बटेश्वर में आस्था का केंद्र है ऊखल



काशी काली काल बटेश्वरम।
कालिंजर महाकाल उक्खला नव प्रकीत्र्यु: ।।

बौद्ध ग्रंथ अवदान कल्पता में देश के जिन नौ ऊखल क्षेत्रों का उल्लेख किया गया है। उनमें से दो बृज की काशी बटेश्वर में होने से तीर्थ श्रद्घालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। साहित्यकार डॉ. बीपी मिश्र कहते है कि बटेश्वर में दो ऊखल क्षेत्र उत्तर और दक्षिण में हैं। (ऊखल क्षेत्र में प्रलय काल में धरती से स्वत: ही जल की धारा फूटती है। बटेश्वर में आज भी 10 से 15 हाथ की गहराई पर भूगर्भ जल मौजूद है।) 

(1) काशी : उत्तर भारत की एक प्रसिद्ध धार्मिक एवं सांस्कृतिक नगरी जिसे वाराणसी अथवा बनारस के नाम से ऊखल क्षेत्र है।

(2) काली:

(3) काल : देवी भगवत पुराण के द्वतीय स्कन्द के अनुसार परासर पुत्र महर्षि वेद व्यास का जन्म कालिन्द्री ( यमुना ) तट पर "काल" नामक ऊखल क्षेत्र पर हुआ था जो अब कालपी है।

मथुरामंडल में बसै, देश भदावर ग्राम।
ऊखल तहाँ प्रसिद्ध महि, क्षेत्र बटेश्वर नाम।।

दो ऊखल क्षेत्र होने के कारण बटेश्वर दर्शन विशेष पुण्य फलदायी होता है। दो ऊखल होने के कारण ही कार्तिक पूर्णिमा पर यहां स्नान के लिए श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है। पौराणिक मान्यता है कि यहां पर स्नान दर्शन पूजन से एक हजार गायों के दान का पुण्य फल मिलता है। 

द्वापर काल में महाभारत के नायक योगेश्वर कृष्ण की पैत्रिक भूमि शौरीपुर (बटेश्वर) उनके पितामह सूरसेन महाराज की राजधानी रही है। उनके पुत्र वसुदेव की जन्मस्थली होने का गौरव भी यह भूमि रखती है। भागवत पुराण के अनुसार वसुदेव की बरात यहीं से मथुरा गई थी। भगवान नेमीनाथ का जन्म भी यहीं हुआ। रिषभ देव पार्श्वनाथ और भगवान महावीर ने अपने पद रज से इस भूमि को पवित्र किया था। यहां के प्राचीन खंडहरों में दो मोहल्लों के नाम पदमन खेड़ा और औंध खेड़ा श्रीकृष्ण के पुत्र और पौत्र के नाम पर रखे गये। 

बटेश्वर का एतिहासिक महत्व भी कम नहीं है। 15वीं शताब्दी में सिकंदर लोदी को इसी भूमि पर भदावर नरेशों के हाथ मुंह की खानी पड़ी थी। शेरशाह सूरी का भी आक्रमण केन्द्र बटेश्वर रहा है। उन्होंने ही हथकांत का किला बनवाया था। पानीपत के युद्ध में शहीद हुये सेनानियों की स्मृति में मराठा सरदार नारु शंकर ने बटेश्वर में मन्दिर का निर्माण कराया था। बटेश्वर नगर कई बार उजड़ा और बसा है। वर्तमान शिव मन्दिर शृंखला को 1646 में तत्कालीन भदावर नरेश बदन सिंह एक कोस लंबा अर्द्ध चंद्राकार बांध बनवाकर अस्तित्व में लाये थे। यहां पर यमुना नदी शिव मन्दिर शृंखला का आचमन कर उल्टी धारा में बहती है। मोक्ष दायिनी यमुना में कार्तिक पूर्णिमा की पावन बेला पर लाखों श्रद्धालु स्नान कर भोले के दर पर मत्था टेकते है । 

महाशिवरात्रि

महाशिवरात्रि  भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह के उपलक्ष्य में मनाई जाती है फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को शिवरात्रि पर्व मनाया जाता है।  माना जाता है कि सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्यरात्रि भगवान शंकर का ब्रह्मा से रुद्र के रूप में अवतरण हुआ था। शिव का का रूप बड़ा अजीब है,  शिव प्रेतों व पिशाचों से घिरे रहते हैं, शरीर पर मसानों की भस्म, गले में सर्पों का हार, कंठ में विष, जटाओं में जगत-तारिणी पावन गंगा तथा माथे में प्रलयंकर ज्वाला है । प्रलय की वेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए ब्रह्मांड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से समाप्त कर देते हैं  इसीलिए इसे महाशिवरात्रि अथवा कालरात्रि कहा गया. महाशिवरात्रि स्वय में महापर्व है पर इस बार ( २० फरवरी २०१२ को ) यह तीन दुर्लभ संयोगों के साथ है जो इतका महत्व और भी बढ़ा रहे है । यह दुर्लभ संयोग है :
  • शिवरात्री का सोमवार को पड़ना - सोमवार को शिव पूजा का विशेस महत्व माना जाता है।
  • शिवरात्री को सर्वार्थ सिद्धि योग का पड़ना - इस महूर्त मैं किया गया पूजन अद्भुत फल देता है।
  • शिवरात्री को श्रवण नक्षत्र है, जिसके देवता भगवान् विष्णु है - इस दिन "हर" और "हरी" का अद्भुत संयोग है।
॥शिवरात्रि व्रतं नाम सर्वपापं प्रणाशनम्। आचाण्डाल मनुष्याणं भुक्ति मुक्ति प्रदायकं॥ 
महाशिवरात्रि  भगवान शंकर का पवित्र दिन ह यह आत्मा को पुनीत करने का महाव्रत है, इसके करने से पापों का नाश होता है, इस दिन शिवभक्त, शिव मंदिरों में जाकर शिवलिंग पर बेल-पत्र आदि चढ़ाते, पूजन  उपवास  तथा रात्रि को जागरण करते हैं। इस  दिन शिव की शादी तीनों भुवनों की अपार सुंदरी तथा शीलवती गौरां जी से हुई थी इसलिए रात्रि में शिवजी की बारात निकाली जाती है। इस व्रत के विधान में सवेरे स्नानादि से निवृत्त होकर उपवास रखा जाता है महाशिवरात्रि पर रुद्राभिषेक करने से अद्भुत लाभ मिलता है । बटेश्वर में सोमवार को महाशिवरात्रि पर्व के मौके पर तीर्थ में श्रद्धालुओं, शिव भक्तों का सैलाब उमड़ेगा। हजारों की तादात में कांवड़ियों द्वारा शिवलिंग पर गंगाजल चढ़ाकर पूजा-अर्चना की जायेगी । ॥ ॐ नमः शिवाय ॥


Sunday, February 1, 2015

बटेश्वर मेला



बटेश्वर मेले का आयोजन आगरा से लगभग 70 किमी0 की दूरी पर स्थित प्रसिद्ध पौराणिक धार्मिक स्थल बटेश्वर में प्रतिवर्ष कार्तिक मास में दीपावली से लगभग एक सप्ताह पूर्व आयोजित किया जाता है, जो पूरे एक माह चलता है।शिव का एक नाम पशुपति भी है, बटेश्वर का पशुमेला इसे सार्थक करता है। बटेश्वर का पशुओं का मेला पूरे भारत में प्रसिद्ध है।

बटेश्वर मेला त्तर भारत का एक महत्वपूर्ण बड़ा पशु मेला है यह मेला जितना प्राचीन है, उतना ही विख्यात भी। इस मेले का आनन्द लेने के लिए देश-विदेश से पर्यटक आते हैं।

किसी समय इस मेले में बरमा के हाथी, पेशावर के ऊँट और काबुल के घोड़े बिकने आते थे। किंतु अब मेले ने दूसरा रूप ले लिया है, फिर भी उत्तर भारत का यह पशुओं का सबसे बड़ा मेला है। बटेश्वर की गुझिया, खोटिया, बताशा और शक्कर-पारे प्रसिद्ध हैं।


मेले के अवसर पर यहाँ बहुत चहल-पहल रहती है, पशुमेला तीन चरणों में पूरा होता है। पहले चरण में ऊँट, घोड़े और गधों की बिक्री होती है, दूसरे चरण में गाय आदि अन्य पशुओं की तथा अंतिम चरण में सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। मेला शुरू होने के एक सप्ताह पहले से ही पशु-व्यापारी अपने पशु लेकर यहां पहुँचने लगते हैं। मेले में पशुओं की विभिन्न प्रकार की दौड़ों का आयोजन भी किया जाता है।

Saturday, June 8, 2013

शिव यात्रा

एक बार भगवान शिव और उनकी पत्नी, पार्वती, वाहन नंदी बैल के साथ बटेश्वर से यात्रा पर निकले। पार्वती जी ने जवान और खूबसूरत सुन्दरी का रूप लिया, जबकि प्रभु बटेश्वरनाथ शिव ने, एक बूढ़े आदमी का रूप ले लिया।. सड़क पर सभी राहगीरों द्वारा एक बूढ़े आदमी और एक युवा महिला की इस अजीब जोड़ी को विस्मय के साथ पर देखा।

Bateshwar.blogspot.inरास्ते में शिव ने पार्वती जी को बैल की सवारी करने को कहा,पार्वती जी नंदी पर बैठ गयी और शिव जी साथ-साथ चलने लगे। राहगीर व गांववाले ये देख कर आलोचना करने लगे "क्या स्वार्थी औरत है वह युवा और स्वस्थ है और फिर भी वह बूढ़े आदमी को पैदल चलने के लिए मजबूर करते हुए आराम से सवारी कर रही है।" ऐसा सुन कर शिव जी ने कहा ''पार्वती देवी, लोगों आप का मजाक उड़ा रहे हैं. "समझदारी इसी में है की में नंदी पर बैठता हूँ और आप साथ-साथ पैदल चलो।" और शिव जी बैठ गए, आगे जाने पर अन्य राहगीर शिव को कोसने लगे ''ये आदमी मोटा-मजबूत और क्रूर है. इस युवा और सौम्य महिला को पैर पर चलने के लिए मजबूर कर रहा है, जबकि खुद सवारी का आनंद ले रहा है।''

यह सुनकर शिवजी और पार्वती दोनों बैल पर चढ़ गए, कम से कम, इन आलोचनाओं से छुटकारा मिलेगा लेकिन वे गलत थे और जैसे ही वे अगले गांव में पहुचे लोगों व्यंगात्मक मुस्कान के साथ चुटकी लेने लगे ''इस निर्लज दम्पति को देखो दोनों निर्दयता से बैल पर चढ़े बेठे है ये इस गरीब प्राणी को मार ही डालेगे।''

अब केवल एक ही विकल्प था। वे बैल से उतर गए और दोनों नंदी के साथ-साथ पैदल चलने लगे, राह में नए लोगों से मुलाकात हुई वे उन पर हंस रहे थे कुछ कहने लगे "क्या मूर्ख है वाहन के रूप में एक बैल ले लिया है और उपयोग नहीं कर रहे है।''

अब शिव जी ने पार्वती जी से कहा की दुनिया की आलोचना-सराहना की परवाह न करते हुए हमें जो ठीक लगे वही करना चाहिए। इस दुनिया में, हम कोई काम अच्छा भले ही करे वह सबको पसंद नहीं आएगा और ना ही सब समर्थन करेंगे। समस्या यह है,कि हमारी दुनिया की प्रकृति यही है. एक साधु चमत्कार दिखाता है तो लोग कहते है ''वह काले जादू करता है और बुरी शक्तियों का उपासक है।'' और एक साधु चमत्कार से बचाता है, तो कुछ शिकायत करते है ''वह कोई चमत्कार नहीं कर सकता वह साधारण है और किसी काम का नहीं है।'' यह हमारी दुनिया की मानसिकता है जो कुछ भी आप करे उसमें दोष निकाला ही जाएगा। दुनिया वाले आप को सीधे कभी नहीं देखेंगे। इसलिए, सांसारिक लोगों के शब्दों पर ध्यान नहीं देते हुए श्रद्धापूर्वक भगवान की पूजा जारी रखे।

Saturday, January 21, 2012

किंवदंति : लिंग परिवर्तन

Bateshwarहम जानते हैं कि लिंग परिवर्तन की किंवदंति भारतीय लोक कथाओं में अज्ञात नहीं हैं । हमे एक बहुत प्राचीन कथा का समरण हो आता है । ये कथा "इला" की है जो की वैवस्वत-मनु की पुत्री थी । वैवस्वत-मनु ने वरुण भगवान से पुत्र प्राप्ति के लिए प्रार्थना की,पर उनके एक पुर्त्री का जनम हुआ, क्यों की वैवस्वत-मनु की पत्नी पुत्री चाहती थी,पिता की देवताओं से प्रार्थना के परिणामस्वरूप वह पुत्री, एक पुरुष "सुद्युम्ना" में बदल गई थी और अंत में भगवन शिव उसे फिर से एक स्त्री में बदल दिया और वह उसी रूप में बुद्ध (बुद्धि) की पत्नी बन गई थी ।

आधुनिक समय में हमें भदावर के भदौरिया राजा की बेटी की बहुत इसी तरह की कहानी सुनने को मिलती है. महाराजा भदावर बदन सिंह भदौरिया और तत्कालीन राजा परमार के साथ घनिष्ठ मित्रता थी । जब उनकी रानियो ने गर्भ धारण किया तब दोनो के बीच समझौता हुआ कि जिसके भी कन्या होगी,वह दूसरे के पुत्र से शादी करेगा, राजा परमार और राजा भदावर दोनो के ही कन्या पैदा हो गई पर राजा भदावर ने अपना वचन पूरा करने के लिए राजा परमार को सूचित कर दिया कि उनके पुत्र पैदा हुआ है । उनकी झूठी बात का परमार राजा को पता नही था वे अपनी कन्या को पालते रहे और राजा भदावर के पुत्र से अपनी कन्या का विवाह करने के लिये बाट जोहते रहे । जब राजा भदावर की कन्या को पता लगा कि उसके पिता ने झूठ बोलकर राजा परमार को उसकी लडकी से शादी का वचन दिया हुआ है, तो वह अपने पिता के वचन को पूरा करने के लिये भगवान शिव की आराधना बटेश्वर में करने लगी । वर्षो की प्राथना के बाद भी उसकी विनती न सुनी जाने के कारण उसने अपने पिता की लाज को बचाने हेतु यमुना नदी मे आत्महत्या के लिये छलांग लगा दी । भगवान शिव की आराधना का चम्त्कार हुआ, और वह कन्या पुरुष रूप मे इसी स्थान पर उत्पन हुई। राजा भदावर ने इस स्थान पर एक सौ एक मन्दिरों का निर्माण करवाया, मुख्य मंदिर में पवित्र शिव लिंग जो बटेश्वरनाथ नाम से प्रसिद्ध हैं । यहां पर यमुना अपने प्राकृतिक मार्ग को छोड़ चार किलोमीटर तक अर्ध-चंद्राकर उल्टी धारा के रूप मे बही हैं ।
 


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